जानिये कब है शरद पूर्णिमा, क्या है शरद पूर्णिमा में खीर का महत्व

शरद पूर्णिमा की रात को चांद की किरणों से बरसता है अमृत

हिंदू धर्म के अनुसार आश्विन मास की शरद पूर्णिमा का बहुत ही खासा महत्व है। पूरे वर्षभर में शरद पूर्णिमा को ही चांद 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है। शरद पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा’ और ‘रास पूर्णिमा’ भी कहते हैं। श्रीकृष्ण ने भी शरद पूर्णिमा के दिन ही महारास रचाया था। कहते है कि शरद पूर्णिमा की रात को चांद की किरणों से अमृत बरसता है। इसलिए इस दिन उत्तर भारत में खीर बनाकर रातभर चांदनी में रखकर दूसरे दिन प्रसाद के रूप में ग्रहण करते है।

कोजागरी और रास पूर्णिमा भी कहा जाता है शरद पुर्णिमा को

इस वर्ष 19 अक्टूबर के दिन शरद पूर्णिमा मनाई जाएगी। इस पूर्णिमा को कोजागरी और रास पूर्णिमा भी कहा जाता है। शरद पूर्णिमा के दिन चांद सोलह कलाओं के परिपूर्ण होता है और कहा जाता है कि इस दिन चांद पृथ्वी के सबसे निकट होता है इसलिए शरद पूर्णिमा को आकाश से अमृत की वर्षा होती है। शरद पूर्णिमा के रात्रि चांद दूधिया रोशनी धरती को नहलाती है। इस सफेद उजाले के बीच पूर्णिमा मनाई जाती है।

जानिए शरद पूर्णिमा तिथि व वार

शरद पूर्णिमा तिथि आरंभ – 19 अक्टूबर (मंगलवार) शाम 07 बजे से
शरद पूर्णिमा तिथि समाप्त – 20 अक्टूबर (बुधवार) रात 08 बजकर 20 मिनट तक

शरद पूर्णिमा में खीर का महत्व

शरद पूर्णिमा को पूर्णरात्रि को खीर बनाकर खुले आसमान के नीचे रखी जाती है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन चन्द्रमा अमृत वर्षा करता है। इसके पीछे वैज्ञानिक तथ्य भी है। दूध में लैक्टिक एसिड होता है। ये चंद्रमा की तेज प्रकाश में दूध में पहले से मौजूद बैक्टिरिया को बढ़ाता है और चांदी के बर्तन में रोग-प्रतिरोधक बढ़ाने की क्षमता होती है। इसलिए खीर को चांदी के बर्तन में रखें। शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की रोशनी सबसे तेज होती है। इस कारण खुले आसमान में खीर रखना सेहत के लिए काफि फायदेमंद होता है।

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